हम पर जो गुज़री, बयाँ कौन करेगा,
ख़ामोश ज़ख़्मों का निशाँ कौन करेगा।
सच की अदालत में खड़े हैं मगर,
झूठों के मेले में पहचान कौन करेगा।
हमने ही देखी है ये रातों की साज़िश,
इन अँधेरों का फिर ऐलान कौन करेगा।
जब अपने ही हाथों ने थामा न दामन,
इस टूटे रिश्ते का अरमान कौन करेगा।
लफ़्ज़ थक गए हैं, आँखें भीगी हुई हैं,
इस दर्द का आख़िर बयान कौन करेगा।
हम चीख़ भी लें तो सज़ा बनती है,
इस दौर में सच का सम्मान कौन करेगा।
हम हर सवाल वक़्त पर छोड़ आए हैं,
“हमदर्द” अब इसका ऐलान कौन करेगा।
“हमदर्द”
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