Thursday, 18 December 2025

हम पर जो गुज़री, बयाँ कौन करेगा,ख़ामोश ज़ख़्मों का निशाँ कौन करेगा

हम पर जो गुज़री, बयाँ कौन करेगा,
ख़ामोश ज़ख़्मों का निशाँ कौन करेगा।

सच की अदालत में खड़े हैं मगर,
झूठों के मेले में पहचान कौन करेगा।

हमने ही देखी है ये रातों की साज़िश,
इन अँधेरों का फिर ऐलान कौन करेगा।

जब अपने ही हाथों ने थामा न दामन,
इस टूटे रिश्ते का अरमान कौन करेगा।

लफ़्ज़ थक गए हैं, आँखें भीगी हुई हैं,
इस दर्द का आख़िर बयान कौन करेगा।

हम चीख़ भी लें तो सज़ा बनती है,
इस दौर में सच का सम्मान कौन करेगा।

हम हर सवाल वक़्त पर छोड़ आए हैं,
“हमदर्द” अब इसका ऐलान कौन करेगा।

“हमदर्द”

Wednesday, 22 October 2025

कर्जदारों की कर्जदारी देखी हमने,मुद्दल से ज़्यादा उधारी देखी हमने

कर्जदारों की कर्जदारी देखी हमने,
मुद्दल से ज़्यादा उधारी देखी हमने

हर दोस्त में सौदागरी देखी हमने,
रिश्तों में भी बाज़ारी देखी हमने

वक़्त ने चेहरे बदल डाले सबके,
सूरत वही, पर अदाकारी देखी हमने

फ़ायदे तक साथ रहे सब हमदम,
नुक़सान में बेग़रज़ी देखी हमने

ख़ामोशियाँ अब सवाल बन बैठीं,
हर जवाब में लाचारी देखी हमने

ज़ुल्म भी करते हैं वो हँसते हँसते,
इंसाफ़ में भी सियासतदारी देखी हमने

जिन्हें चाहा था दिल से, वही पराए निकले,
मोहब्बत में भी व्यापारी देखी हमने

हर एक मुस्कान के पीछे दर्द छुपा था,
ख़ुशियों की भी बीमारी देखी हमने

ग़रीब रोता रहा छत की आस में,
अमीरों की दीवार ऊँचाई देखी हमने

अब तो खुद से भी रिश्ता अजनबी लगता है,
आईने में भी दूरी देखी हमने

हमदर्द को अब किसी से क्या गिला रहे,
हर वफ़ा में ग़द्दारी देखी हमने

✍️ अज़ीम "हमदर्द"